मथुरा के निजी स्कूलों में मौत का इंतज़ार? अग्निशमन विभाग, PWD और MVDA की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल
मथुरा,(समाचार सुपरफास्ट), रिपोर्टर आकाश चतुर्वेदी ।
लखनऊ में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि मथुरा का प्रशासनिक तंत्र अब भी गहरी नींद में है। जिले के अनेक निजी विद्यालयों,कोचिंग संस्थानों में हजारों बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है, जबकि कागज़ों में सब कुछ “मानकानुसार” दिखाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद जागेगा, या फिर बच्चों की जान की कीमत पर कागज़ी प्रमाण-पत्रों का खेल चलता रहेगा?
जिले में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि अग्निशमन विभाग, लोक निर्माण विभाग (PWD) और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह सवालों के घेरे में है। यदि भवनों में गंभीर कमियां मौजूद हैं, तो फिर अग्नि सुरक्षा, भवन सुरक्षा और मानचित्र स्वीकृति से संबंधित प्रमाण-पत्र आखिर किस आधार पर जारी किए गए?
कागज़ों में सुरक्षित, ज़मीन पर खतरे का साम्राज्य?
मथुरा महोली रोड स्थित रमनलाल शोरावाला पब्लिक स्कूल को लेकर सामने आए तथ्यों ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। तृतीय तल पर टीन शेड और पीवीसी सामग्री का उपयोग करके कमरे बने हुए हैं, जहां नियमित रूप से कक्षाएं संचालित होती हैं।
ऐसी परिस्थिति में सैकड़ों बच्चों की सुरक्षित निकासी लगभग असंभव हो सकती है। प्रश्न यह है कि क्या संबंधित विभागों ने कभी इस पहलू की गंभीरता से जांच की?
अग्निशमन विभाग की भूमिका पर सवाल
यदि विद्यालय में पर्याप्त अग्निशामक यंत्र, फायर अलार्म, स्मोक डिटेक्टर, फायर हाइड्रेंट, होज़ रील, आपातकालीन निकास और फायर एस्केप सीढ़ियां मानकों के अनुरूप नहीं हैं, तो अग्निशमन विभाग द्वारा जारी प्रमाण-पत्रों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
जनता पूछ रही है- क्या निरीक्षण वास्तव में स्थल पर जाकर किए जाते हैं? क्या जारी प्रमाण-पत्रों की शर्तों का पालन किया जाता है? या विभागीय अधिकारियों ने केवल कागज़ देखकर अग्नि सुरक्षा प्रमाण पत्र दे दिया जाता है
यदि कमियां मौजूद हैं तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
PWD और MVDA भी कठघरे में
भवन सुरक्षा और निर्माण मानकों की निगरानी करने वाले विभागों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि किसी भवन में संरचनात्मक जोखिम हैं, तो क्या संबंधित विभागों ने कभी विस्तृत तकनीकी परीक्षण कराया जाता है? यह लापरवाही किस स्तर तक स्वीकार्य मानी जाएगी?बिना जांच भवन सुरक्षा प्रमाण पत्र किस आधार पर दे दिए गए
जनचर्चा में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या विभागीय निरीक्षण केवल फाइलों तक सीमित हैं और वास्तविक स्थिति जानने की किसी को फुर्सत नहीं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रशासन हादसे का इंतजार कर रहा है?
मथुरा के अभिभावकों में बढ़ती चिंता का कारण यह है कि हर बड़े हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं, जिम्मेदार अधिकारियों के बयान आते हैं, मुआवजे घोषित होते हैं और कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। लेकिन जब तक कोई त्रासदी नहीं होती, तब तक सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
सबसे बड़ा और असहज प्रश्न यही है क्या मथुरा में भी किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?
जवाबदेही तय होनी चाहिए
यदि जांच में सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो केवल विद्यालय प्रबंधन ही नहीं, बल्कि निरीक्षण करने वाले अधिकारियों, प्रमाण-पत्र जारी करने वाले विभागों और निगरानी के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
बच्चों की सुरक्षा कोई औपचारिकता नहीं है। यह ऐसा विषय है जिस पर लापरवाही का अर्थ सीधे मानव जीवन को खतरे में डालना है।
जनता की मांग
जिले के सभी निजी विद्यालयों,कोचिंग संस्थानों की अग्नि सुरक्षा, भवन सुरक्षा और विद्युत सुरक्षा की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए।
जांच समिति में अग्निशमन विभाग, PWD और MVDA से अलग स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।
सभी निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं।
नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर विद्यालयों के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय की जाए।
फर्जी, भ्रामक अथवा कागज़ी अनुपालन के मामलों में आपराधिक कार्रवाई पर विचार किया जाए।
सबसे बड़ा सवाल
क्या मथुरा का प्रशासन बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद वही घिसे-पिटे बयान दोहराए जाएंगे कि “जांच के आदेश दे दिए गए हैं”?
यदि अग्नि सुरक्षा प्रमाण-पत्र ,भवन सुरक्षा प्रमाण पत्र,वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और बच्चों की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।
